Trending News
Trending

Swami Vivekananda Jayanti Know About Swami Vivekananda And Jamsetji Tatas Meeting – 30 साल के विवेकानंद और 54 साल के जमशेदजी टाटा, एक मुलाकात और बदल गया भारत का इतिहास..!

जब विवेकानंदजी वर्ल्ड रिलीजन कॉन्फ्रेंस में भाग लेने के लिए अमेरिका जा रहे थे और उसी शिप ‘एसएस इम्प्रेस ऑफ इंडिया’पर सवार थे, जमशेदजी टाटा। शिप बेंकूवर जा रहा था। वहां से विवेकानंद को शिकागो के लिए ट्रेन लेनी थी। उस वक्त तीस साल के युवा थे विवेकानंद और 54 साल के थे जमशेदजी टाटा, उम्र में इतने फर्क के बावजूद  दोनों ने काफी समय साथ गुजारा।

शिप यात्रा के दौरान कई मुद्दों पर स्वामी विवेकानंद और जमशेदजी टाटा में चर्चा हुई।
– फोटो : Social Media

ख़बर सुनें

पीएम मोदी ने स्वामी विवेकानंदजी के शिकागो भाषण की 125वीं सालगिरह पर एक कार्यक्रम में जिक्र किया था कि कैसे विवेकानंदजी ने मेक इन इंडिया का आव्हान करते हुए जमशेदजी टाटा को इसके लिए प्रेरणा दी थी। आज विवेकानंद के दिए ऐतिहासिक भाषण को 126 साल से ज्यादा हो गए हैं। विवेकानंद के इस भाषण की पूरी दुनिया दीवानी हो गई थी। यही वह भाषण था जिसने भारत की दार्शनिक मेधा, गूढ़  हिंदू धर्म को संक्षिप्त रूप से लेकिन प्रभावी तरीके से पूरी दुनिया के सामने पहुंचाया था।

बहरहाल, भाषण के अलावा विवेकानंद कई रूपों में भी याद किए जाते हैं। कुछ साल साल पहले विवेकानंद के शिकागो में दिए भाषण को 125 साल होने पर पीएम मोदी ने भी याद किया गया। आइए जानते हैं क्या थी वह घटना जिसका जिक्र मीडिया में चर्चा में आ गया था।

क्या बातें की थी विवेकानंद ने? 

इस शिप यात्रा के दौरान कई मुद्दों पर स्वामी विवेकानंद और जमशेदजी टाटा में चर्चा हुई। टाटा ने बताया कि वो भारत में स्टील इंडस्ट्री लाना चाहते हैं। तब स्वामी विवेकानंद ने उन्हें सुझाव दिया कि टेक्नोल़ॉजी ट्रांसफर करेंगे तो भारत किसी पर निर्भर नहीं रहेगा, युवाओं को रोजगार भी मिलेगा। तब टाटा ने ब्रिटेन के इंडस्ट्रियलिस्ट से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की बात की, लेकिन उन्होंने ये कहकर मना कर दिया कि फिर तो भारत वाले हमारी इंडस्ट्री को खा जाएंगे।

इधर, तब टाटा अमेरिका गए और वहां के लोगों से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का भी समझौता किया। लोग बताते हैं कि इसी से टाटा स्टील की नींव पडी और जमशेदपुर मे पहली फैक्ट्री लगी। इस बात का जिक्र आज भी टाटा बिजनेस घराने से जुड़ी वेबसाइट्स पर मिल जाता है। इस पूरी मुलाकात की जानकारी स्वामीजी ने अपने भाई महेन्द्र नाथ दत्त को पत्र लिखकर दी थी।

जमशेद जी हैरान थे विवेकानंद को देखकर 

जमशेदजी टाटा भगवा वस्त्रधारी उस युवा के चेहरे का तेज और बातें सुनकर काफी हैरान थे। भारत को कैसे सबल बनाना है इस पर उनकी राय एकदम स्पष्ट थी, ना केवल आर्थिक क्षेत्र में बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में भी। विवेकानंद ने एक और काफी अहम प्रेरणा जमशेदजी टाटा को इस यात्रा के दौरान दी। वो थी भारत में एक टॉप लेवल की यूनीवर्सिटी खोलना जहां से वर्ल्ड लेवल के स्टूडेंट्स देश भर में निकलें, जिसमें ना केवल साइंस की रिसर्च हो बल्कि ह्यूमेनिटी की भी पढ़ाई हो।

टाटा ने दोनों ही बातों को गंभीरता से लिया भी, उसके बाद टाटा अपने रास्ते पर और स्वामी अपने रास्ते पर। इस मुलाकात में दो बातें टाटा ने स्वामीजी से समझीं, एक गरीब भारतीय युवा को भरपेट खाना मिल जाए और दूसरी शिक्षा मिल जाए तो वो देश की तकदीर बदल सकता है, और टाटा ने रोजगार और शिक्षा को अपना मिशन बना लिया।

ये लिखा था ब्रिटेन के अखबारों में 

हालांकि दोनों की ये पहली मुलाकात थी, लेकिन टाटा उनसे काफी प्रभावित हुए। स्वामी जी का सम्मान टाटा की नजरों में तब और भी बढ़ गया, जब ब्रिटेन के अखबारों ने उनके भाषण के बाद लिखा-

स्वामीजी 1897 में भारत आए और जब वो लौटे तो लोग उनकी घोडागाड़ी में से घोड़े निकालकर खुद जुत गए, ऐसे स्वागत से अभिभूत हो गए स्वामी जी। स्वामीजी ने भारतवासियों में इतना आत्मविश्वास बढ़ा दिया था कि हर कोई उन्हें सुनने को उतावला था।

विवेकानंद से प्रभावित टाटा ने लिखा था ये खत 

 जब टाटा ने स्वामीजी की इतनी प्रशंसा सुनी तो वो काफी खुश हुए और 23 नवम्बर 1898 को उन्हें एक खत लिखा है, वो खत आप यहां पढ़ सकते हैं—

इस खत में उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस की चर्चा की, जिसके लिए बाद में वायसराय लॉर्ड कर्जन ने अनुमति नहीं दी। हालांकि टाटा ने इस इंस्टीट्यूट के लिए उस दौर में पूरे तीस लाख रुपए का ऐलान कर दिया, और विवेकानंद जी से मदद मांगी।

उसके बाद कैसे स्वामीजी की मौत के बाद, यहां तक टाटा की मौत के बाद भी स्वामीजी की शिष्या भगिनी निवेदिता ने कोलकाता से लंदन तक कैसे आईआईएससी के सपने को पूरा करने के लिए, उसकी अनुमति दिलाने के लिए, फंड दिलवाने के लिए अथक प्रयास किए।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें [email protected] पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.

विस्तार

पीएम मोदी ने स्वामी विवेकानंदजी के शिकागो भाषण की 125वीं सालगिरह पर एक कार्यक्रम में जिक्र किया था कि कैसे विवेकानंदजी ने मेक इन इंडिया का आव्हान करते हुए जमशेदजी टाटा को इसके लिए प्रेरणा दी थी। आज विवेकानंद के दिए ऐतिहासिक भाषण को 126 साल से ज्यादा हो गए हैं। विवेकानंद के इस भाषण की पूरी दुनिया दीवानी हो गई थी। यही वह भाषण था जिसने भारत की दार्शनिक मेधा, गूढ़  हिंदू धर्म को संक्षिप्त रूप से लेकिन प्रभावी तरीके से पूरी दुनिया के सामने पहुंचाया था।

बहरहाल, भाषण के अलावा विवेकानंद कई रूपों में भी याद किए जाते हैं। कुछ साल साल पहले विवेकानंद के शिकागो में दिए भाषण को 125 साल होने पर पीएम मोदी ने भी याद किया गया। आइए जानते हैं क्या थी वह घटना जिसका जिक्र मीडिया में चर्चा में आ गया था।

दरअसल, ये बात 1893 की है, जब विवेकानंदजी वर्ल्ड रिलीजन कॉन्फ्रेंस में भाग लेने के लिए अमेरिका जा रहे थे और उसी शिप ‘एसएस इम्प्रेस ऑफ इंडिया’पर सवार थे, जमशेदजी टाटा। शिप बेंकूवर जा रहा था। वहां से विवेकानंद को शिकागो के लिए ट्रेन लेनी थी। उस वक्त तीस साल के युवा थे विवेकानंद और 54 साल के थे जमशेदजी टाटा, उम्र में इतने फर्क के बावजूद  दोनों ने काफी समय साथ गुजारा।

Alkasol Syrup Uses in Hindi अल्कासोल सिरप: उपयोग, साइड इफेक्ट्स,

क्या बातें की थी विवेकानंद ने? 

इस शिप यात्रा के दौरान कई मुद्दों पर स्वामी विवेकानंद और जमशेदजी टाटा में चर्चा हुई। टाटा ने बताया कि वो भारत में स्टील इंडस्ट्री लाना चाहते हैं। तब स्वामी विवेकानंद ने उन्हें सुझाव दिया कि टेक्नोल़ॉजी ट्रांसफर करेंगे तो भारत किसी पर निर्भर नहीं रहेगा, युवाओं को रोजगार भी मिलेगा। तब टाटा ने ब्रिटेन के इंडस्ट्रियलिस्ट से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की बात की, लेकिन उन्होंने ये कहकर मना कर दिया कि फिर तो भारत वाले हमारी इंडस्ट्री को खा जाएंगे।

इधर, तब टाटा अमेरिका गए और वहां के लोगों से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का भी समझौता किया। लोग बताते हैं कि इसी से टाटा स्टील की नींव पडी और जमशेदपुर मे पहली फैक्ट्री लगी। इस बात का जिक्र आज भी टाटा बिजनेस घराने से जुड़ी वेबसाइट्स पर मिल जाता है। इस पूरी मुलाकात की जानकारी स्वामीजी ने अपने भाई महेन्द्र नाथ दत्त को पत्र लिखकर दी थी।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button